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समुद्रफेन गुण- समुद्रफेन, फेन,

समुद्रफेन गुण- समुद्रफेन, फेन –

◆समुद्रफेन यह समुद्र का झाग नहीं है वरन् यह एक समुद्री जीव (मछली) का अस्थिपञ्जर (या कवच) है, जो कुछ समय बाद विशेष आकृति का हो जाता है और समुद्र के पानी पर तैरता रहता है।

◆समुद्रफेन के टुकड़े २.५-७.५ से.मी. चौड़े और १२-२५ से.मी. लम्बे होते हैं।

◆ये लम्बे, चिपटे, आयताकार अथवा अण्डाकार, सफेदी लिये हुये, कठोर तथा भंगुर होते हैं।

◆इसकी बाड़ा सतह कई परतों से बनी दिखलाई देती है तथा सुचूर्ण्य होती है।

◆भीतरी सतह कठोर, सुधिर एवं आसानी से टूटने वाली होती है। इसका स्वाद फीका, तीक्ष्ण तथा क्षारीय होता है।

समुद्रफेन के गुण और प्रयोग-
◆इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत कम होता है। यह खड़िया के समान अम्लत्व दूर करने वाला तथा ग्राही एवं स्थानिक उपशामक है।

◆समुद्रफेन का सूक्ष्म चूर्ण कर्णनाव तथा कर्णपीड़ा के लिए कानों में डालते हैं।

◆समुद्रफेन मुख तथा दाँतों के विकारों में यह दन्तमञ्जन की तरह उपयोग में आता है तथा

◆झांई, मुहांसे, व्यंग तथा चर्म के अन्य विकारों में इसका सूक्ष्मचूर्ण या नींबू के रस के साथ इसका लेप लगाया जाता है।

◆गर्मी के दिनों में उत्पन्न घम्हौरी में गुलाब जल के साथ शरीर पर इसे लगाते हैं।

◆समुद्रफेन का नेत्र रोगों में विशिष्ट स्थान है।

◆लेखन गुण के कारण नेत्रशुक्ल, जाला, धुंध आदि में सुरमा के समान या सुरमा में मिलाकर इसे काम में लाते हैं।

◆वर्त्मदाह में इसे गुलाब जल और सैन्धव के साथ महीन पीसकर आँख में लगाते हैं।

◆कर्णलाव में समुद्रफेन को तिल तैल में सिद्ध करके उसका उपयोग करते हैं।

◆यद्यपि आयुर्वेद में इसका आंतरिक प्रयोग नहीं दिखाई देता तथापि यह चूने का अच्छा सेन्द्रिय योग है जिसका आन्तरिक उपयोग भी किया जा सकता है।

Disclaimer: Please take these remedies with the help of a doctor.

प्रस्तुतकर्ता :-
डॉ पंकज कुमार ब्रह्माणिया
जनरल फिजिशियन
( काय चिकित्सक) ।
Lunar Astro..

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